
सूर्य देव पूजा
सूर्य देव को धन्यवाद देने की शांत सुबह की पूजा और अर्घ्य
यह आमतौर पर रविवार को सूर्योदय के समय की जाती है, और कई परिवार मकर संक्रांति और रथ सप्तमी पर भी इसे करते हैं।
लगभग 20 से 30 मिनट
सूर्य पूजा सुबह का एक शांत पल है, जिसमें हम रोशनी, गर्मी और नए दिन के लिए सूर्य देव को धन्यवाद देते हैं। इसके लिए पंडित जी ज़रूरी नहीं; ताज़ा जल, कुछ फूल और शांत मन काफ़ी हैं। हर परिवार और हर क्षेत्र में तरीक़ा थोड़ा अलग होता है, इसलिए जहाँ आपके परिवार या पंडित जी का तरीक़ा इस गाइड से अलग हो, वहाँ उन्हीं का तरीक़ा अपनाएँ।
ज़रूरी सामग्री
सामान जमा करते हुए हर चीज़ पर टिक लगाइए। टिक इसी फ़ोन में रहते हैं।
एक दिन पहले
- सूर्योदय से थोड़ा पहले उठें और एक रात पहले अपने शहर का सूर्योदय का समय देख लें।
- स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें; कई परिवार रविवार को लाल या नारंगी कपड़े पहनना पसंद करते हैं।
- तांबे के लोटे में ताज़ा पानी भर लें और थाली में फूल, चावल और कुमकुम तैयार रखें।
- दीये में घी और बत्ती तैयार रखें, और माचिस वेदी के पास सुरक्षित रखें।
- ऐसी जगह चुनें जहाँ पूर्व की ओर मुँह करके खड़े हो सकें, जैसे बालकनी, छत या खुली खिड़की।
कदम-दर-कदम विधि
- 1
जल्दी उठें और तैयार हों
सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और साफ़ कपड़े पहनें। मन शांत रखें और फ़ोन दूर रख दें। कुछ धीमी साँसें दिन की शांत शुरुआत में मदद करती हैं।
- 2
थाली और लोटा तैयार करें
तांबे के लोटे में साफ़ पानी भरें। उसमें चुटकी भर चावल, थोड़े तिल, थोड़ा लाल चंदन या कुमकुम और एक लाल फूल डालें। थाली में दीया, अगरबत्ती, फूल और मिठाई सजा लें।
- 3
छोटी वेदी सजाएँ
नीची चौकी पर या पूजा के कोने में साफ़ कपड़ा बिछाएँ और सूर्य देव की तस्वीर रखें, हो सके तो मुख पूर्व की ओर रखें। अपने ऊपर और सामग्री पर गंगाजल की कुछ बूँदें छिड़कें।
- 4
दीया और अगरबत्ती जलाएँ
घी का दीया और अगरबत्ती जलाएँ। हाथ जोड़कर अपने शब्दों में कहें कि आप प्रकाश और नए दिन के लिए सूर्य देव को धन्यवाद देने यह पूजा कर रहे हैं।
- 5
तिलक और फूल अर्पित करें
तस्वीर पर थोड़ा लाल चंदन या कुमकुम और कुछ चावल के दाने लगाएँ। चरणों में लाल फूल चढ़ाएँ। फिर अपने माथे पर भी छोटा-सा तिलक लगाएँ।
- 6
बाहर जाएँ और सूर्य की ओर मुख करें
लोटा लेकर पूर्व की ओर मुँह करके खड़े हों जब सूर्य उग रहा हो। सीधे खड़े रहें, पैर साथ रखें, दोनों हाथों से लोटा पकड़ें और एक शांत पल धन्यवाद के लिए लें। सूर्य को सीधे घूरकर न देखें।
- 7
अर्घ्य दें
लोटे को छाती या माथे की ऊँचाई तक उठाएँ और पानी को धीरे-धीरे पतली धार में डालें, जो किसी थाली या गमले में गिरे। जल डालते समय मंत्र बोलें। चाहें तो गिरती धार के बीच से सुबह की कोमल रोशनी देखें, सीधे सूर्य को नहीं।
- 8
परिक्रमा और प्रणाम
हाथ जोड़कर अपनी जगह पर ही धीरे-धीरे घड़ी की दिशा में घूमें। फिर परिवार के स्वास्थ्य और शांति की छोटी प्रार्थना के साथ सूर्य को प्रणाम करें। डाले हुए जल पर पैर न रखें।
- 9
भोग और मंत्र जाप
वेदी पर लौटकर गुड़, फल और मिठाई तस्वीर के सामने रखें और उनके चारों ओर पानी की कुछ बूँदें छिड़कें। शांति से बैठकर मंत्र 11 या 108 बार बोलें, गिनती माला या चावल के दानों से करें।
- 10
आरती करें
थाली में कपूर जलाएँ और सब मिलकर सूर्य आरती, "ॐ जय सूर्य भगवान", गाएँ। घंटी धीरे से बजाते हुए थाली को तस्वीर के सामने घड़ी की दिशा में धीरे-धीरे घुमाएँ। सब लौ के ऊपर से हाथ घुमाकर आँखों से लगाएँ।
- 11
समापन और प्रसाद
प्रणाम करें, किसी भी भूल के लिए क्षमा माँगें और धन्यवाद कहें। सबको प्रसाद बाँटें और कलाई पर कलावा बाँधें। मकर संक्रांति पर कई परिवार तिल-गुड़ और खिचड़ी बाँटते हैं, और रथ सप्तमी पर कुछ लोग सूर्य के रथ की रंगोली बनाते हैं; आपके परिवार में जो होता है वही करें।
ॐ घृणि सूर्याय नमः
Om Ghrini Suryaya Namah
ॐ, मैं तेजस्वी सूर्य को प्रणाम करता हूँ।
काम की बातें
- सूर्योदय के बाद पहले एक घंटे में अर्घ्य दें, जब रोशनी कोमल होती है और आँखों को चुभती नहीं।
- सूर्य बादलों या इमारतों के पीछे हो तो भी पूर्व की ओर मुँह करके जल अर्पित करें; भाव ही मायने रखता है।
- अर्घ्य का जल गमले या थाली में डालें, ताकि उस पर किसी का पैर न पड़े।
- बच्चों को शामिल करें: वे फूल चुन सकते हैं, आपके साथ लोटा पकड़ सकते हैं और मंत्र दोहरा सकते हैं।
- मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ तैयार रखें, और रथ सप्तमी पर सरल रंगोली या कुछ अतिरिक्त फूल सुंदर जुड़ाव हैं।
- किसी रविवार सूर्योदय छूट जाए तो सुबह थोड़ी देर बाद कर लें, या अगले हफ़्ते फिर से कोशिश करें।
इन बातों का ध्यान रखें
- सूर्य को सीधे न घूरें, ख़ासकर जल या किसी काँच के बीच से; इससे आँखों को नुकसान हो सकता है।
- जलते दीये या कपूर को अकेला न छोड़ें, ख़ासकर पर्दों या बच्चों के पास।
- जल ऐसी जगह न डालें जहाँ लोग चलते हों, और पूजा जल्दबाज़ी में न करें या बीच में फ़ोन न देखें।
- छोटी-मोटी भूलों या छूटे हुए दिन की चिंता न करें; पूजा को दोबारा करने की ज़रूरत नहीं है।
परिवार और क्षेत्र के अनुसार तरीका थोड़ा अलग हो सकता है। जहाँ अलग हो, वहाँ अपने परिवार या पंडित जी का तरीका मानिए।