
कार्तिकेय पूजा
भगवान कार्तिकेय, जिन्हें मुरुगन भी कहते हैं, की सरल घरेलू पूजा
यह आमतौर पर मंगलवार को की जाती है, और कई परिवार स्कंद षष्ठी और थाईपूसम पर भी इसे करते हैं।
लगभग 30 से 40 मिनट
भगवान कार्तिकेय, जिन्हें भारत के अलग-अलग हिस्सों में मुरुगन, स्कंद या सुब्रमण्य कहा जाता है, साहस, अनुशासन और विद्या के युवा देवता के रूप में स्मरण किए जाते हैं। यह पूजा परिवार के साथ धन्यवाद का एक शांत पल है, इसके लिए पंडित जी ज़रूरी नहीं; साफ़ कोना और सरल भेंट काफ़ी हैं। हर परिवार और हर क्षेत्र में तरीक़ा थोड़ा अलग होता है, इसलिए जहाँ आपके परिवार या पंडित जी का तरीक़ा इस गाइड से अलग हो, वहाँ उन्हीं का तरीक़ा अपनाएँ।
ज़रूरी सामग्री
सामान जमा करते हुए हर चीज़ पर टिक लगाइए। टिक इसी फ़ोन में रहते हैं।
एक दिन पहले
- घर और पूजा के कोने की सफ़ाई कर लें, और तस्वीर या मूर्ति को हल्के से धो या पोंछ लें।
- फूल, फल और गुड़ ले आएँ और देख लें कि सूची की हर चीज़ तैयार है।
- स्नान करके ताज़े कपड़े पहनें; कई परिवार मंगलवार को लाल या पीले कपड़े पहनना पसंद करते हैं।
- चौकी और लाल कपड़ा तैयार रखें, दीये में बत्ती लगा लें और माचिस पास में सुरक्षित रखें।
- स्कंद षष्ठी या थाईपूसम पर व्रत रखना हो तो अपने परिवार के तरीक़े से पहले तय कर लें, और तबीयत ठीक न हो तो हल्का भोजन करें।
कदम-दर-कदम विधि
- 1
सफ़ाई और तैयारी
पूजा के कोने की सफ़ाई करें, स्नान करके ताज़े, साफ़ कपड़े पहनें। शुरू करने से पहले एक मिनट शांत मन से बैठें।
- 2
वेदी सजाएँ
पूजा के कोने में चौकी रखें और उस पर लाल कपड़ा बिछाएँ। कार्तिकेय जी को उस पर बिठाएँ, हो सके तो मुख पूर्व या उत्तर की ओर रखें, और नीचे थोड़े चावल रखें। थाली और सारी सामग्री पास में रखें।
- 3
कलश स्थापित करें
कलश में पानी भरें, उसमें एक सिक्का और चुटकी भर चावल डालें और चारों ओर कलावा बाँधें। ऊपर नारियल रखें और इसे तस्वीर के पास रखें।
- 4
दीया जलाएँ और बैठें
घी का दीया और अगरबत्ती जलाएँ। आसन पर बैठकर कुछ शांत साँसें लें और अपने ऊपर तथा सामग्री पर गंगाजल की कुछ बूँदें छिड़कें। अपने शब्दों में कहें कि आप शांत मन से यह पूजा कर रहे हैं।
- 5
पहले गणेश जी को याद करें
हाथ जोड़कर तीन बार "ॐ गं गणपतये नमः" बोलें। परंपरा है कि सबसे पहले गणेश जी को याद किया जाता है, ताकि पूजा शांति से पूरी हो।
- 6
कार्तिकेय जी का स्वागत
अपने शब्दों में भगवान कार्तिकेय को घर आने का निमंत्रण दें। थोड़ा जल अर्पित करें, फिर कुमकुम, चंदन और चावल का तिलक लगाएँ। मूर्ति धातु की हो तो पहले उसे पानी और साफ़ कपड़े से हल्के से पोंछ सकते हैं।
- 7
फूल और पान अर्पित करें
माला और लाल फूल उनके चरणों में रखें। पान के पत्ते सुपारी और एक सिक्के के साथ चढ़ाएँ। परिवार का हर सदस्य एक-एक फूल भी चढ़ा सकता है।
- 8
भोग लगाएँ
गुड़, केले या अन्य फल और मिठाई थाली में सजाकर देवता के सामने रखें। थाली के चारों ओर पानी की कुछ बूँदें छिड़कें और हाथ जोड़कर एक मिनट के लिए अर्पित करें। पूजा पूरी होने तक इसे ढककर रखें।
- 9
मंत्र जाप
शांति से बैठकर "ॐ शरवणभवाय नमः" 11 या 108 बार बोलें। गिनती माला से या चावल के दानों से कर सकते हैं। पूरा परिवार साथ बोल सकता है, और बच्चे बस आपके पीछे दोहरा सकते हैं। थाईपूसम पर कई परिवार मुरुगन के भजन भी गाते हैं या "वेल वेल" बोलते हैं।
- 10
आरती करें
थाली में कपूर जलाएँ और सब मिलकर कार्तिकेय आरती, "जय जय आरती वीर कुमारा", या कोई भी आरती जो आपके परिवार को आती हो, गाएँ। घंटी धीरे से बजाते हुए थाली को देवता के सामने धीरे-धीरे घड़ी की दिशा में घुमाएँ। फिर सब लौ के ऊपर से हाथ घुमाकर हल्के से आँखों से लगाएँ।
- 11
समापन और प्रसाद
प्रणाम करें, पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा माँगें और धन्यवाद कहें। सबको प्रसाद बाँटें और कलाई पर कलावा बाँधें। स्कंद षष्ठी या थाईपूसम पर अपने परिवार के तरीक़े से व्रत खोलें। मुख्य दीये को सुरक्षित रूप से अपने आप जल जाने दें।
ॐ शरवणभवाय नमः
Om Sharavana Bhavaya Namah
ॐ, मैं शरवण वन में जन्मे भगवान कार्तिकेय को प्रणाम करता हूँ।
काम की बातें
- मंगलवार की सुबह या शाम दोनों ठीक हैं; वह समय चुनें जो आपके परिवार के लिए शांत हो।
- स्कंद षष्ठी और थाईपूसम पर कई परिवार सरल व्रत रखते हैं या हल्का भोजन करते हैं; अपने परिवार की रीति और अपनी सेहत के अनुसार चलें।
- पूजा का स्थान साफ़ और रोशन रखें, और शुरू करने से पहले मुख्य दीया जला लें।
- बच्चों को शामिल करें: वे फूल रख सकते हैं, मंत्र बोल सकते हैं और प्रसाद बाँट सकते हैं।
- जितना आराम से हो सके उतना ही चढ़ाएँ; सच्चे मन की भेंट लंबी सूची से ज़्यादा मायने रखती है।
- कोई चरण भूल जाएँ तो शांति से आगे बढ़ें; पूजा का असली भाव श्रद्धा है।
इन बातों का ध्यान रखें
- जलते दीये या कपूर को अकेला न छोड़ें, ख़ासकर पर्दों या बच्चों के पास।
- टूटे चावल या मुरझाए फूल चढ़ाने से बचें; ताज़े और साबुत सबसे अच्छे रहते हैं।
- पूजा जल्दबाज़ी में न करें और बीच में फ़ोन देखने से बचें।
- सेहत के अनुकूल न हो तो व्रत न रखें, और छोटी-मोटी भूलों की चिंता न करें; पूजा को दोबारा करने की ज़रूरत नहीं है।
परिवार और क्षेत्र के अनुसार तरीका थोड़ा अलग हो सकता है। जहाँ अलग हो, वहाँ अपने परिवार या पंडित जी का तरीका मानिए।